किस रहस्य ने भारतीयों को बेरोजगार बना दिया?

बेरोजगारी की समस्या के कारण – berojgari ki samasya

berojgari ki samasya in hindi

ये बड़े आश्चर्य की बात है की 70 साल से सरकारों ने तरह तरह के प्रयास किए फिर भी बेरोजगारी खत्म होना तो दूर कम होने का भी नाम नहीं लेती!

कुछ लोग इसका कारण निरक्षरता को मानते रहे हैं लेकिन अगर ऐसा होता तो पढ़े लिखे युवा इतनी बड़ी संख्या में बेरोजगार (berojgar) क्यों होते? तो फिर क्या कारण है?

भारत की बहुत बड़ी लोकसंख्या को भी इसके लिए जिम्मेदार कहा जाता है और ये काफी हद तक सही भी है उदाहरण के लिए 1951 में भारत में मुस्लिम आबादी करीब 3 करोड़ थी जो कि 2011 में बढ़कर करीब 18 करोड़ हो गई। इससे ये साफ होता है कि जनसंख्या का इतनी तेजी से बढ़ना बेरोजगारी, संसाधनों की कमी और ऐसी कई दूसरी समस्याओं को जरूर जन्म देगा। लेकिन ये भी बेरोजगारी का सबसे बड़ा कारण नहीं है!


तो फिर भारत में बेरोजगारी के लिए कौन जिम्मेदार है

इसका उत्तर है भारत की जतिव्यवस्था!

{मतलब भारत में जो जातिवाद है, लोग जातियों में बंटे हुए हैं इसीलिए बेरोजगार हैं? यहीं न?

नहीं बिल्कुल नहीं!

बात इससे एकदम उल्टी है!}

लेकिन कैसे?

क्या सचमे आप इसका उत्तर जानना चाहते हैं?

तो आपको कुछ चीजों के बारे में खुद सोचना होगा! क्या जातिवाद और जातिव्यवस्था दोनों एक ही है? नहीं जातिवाद मतलब उंच नीच का भेदभाव जबकि जतीव्यवस्था एकदम अलग वर्णव्यवसथा है। ये वर्णव्यवस्था रोजगार के लिए बहुत आवश्यक है। यहीं उस प्रश्न का उत्तर है।

अगर ये आर्टिकल पढ़ते समय आपकी रुचि थोड़ी भी कम हुई तो कृपया इसे पढ़ना बंद कर दीजिएगा।

तो ठीक है, आगे बढ़ते हैं…

मैंने कहा, जतीव्यवस्था रोजगार पाने के लिए बहुत आवश्यक है। लेकिन ये उत्तर अपने आप में खुद ही एक बहुत बड़ा प्रश्न है और इसे सुनते ही लोगों के मन में सैकड़ों सवालों की बाढ़ आ जाती है।

अगर लकवा मतलब पैरालिसिस की वजह से किसी का हाथ काम करना बंद कर दे तो क्या उसके हाथ को बैंडेज करने से वो ठीक हो सकता है? क्या उस हाथ का ऑपरेशन करने से ठीक हो पाएगा?

नहीं बिल्कुल नहीं क्योंकि हाथ भले ही काम नहीं कर रहा है लेकिन वो फिर भी पूरी तरह से स्वस्थ है। फिर भी उसका दिमाग से संपर्क टूट गया है इसलिए दिमाग उसे हिला नहीं पा रहा। इसका कारण दिमाग की किसी नस में खून का ना पहुंचना हो सकता है। इसलिए जब तक वो ठीक ना हो, तब तक सिर्फ हाथ का इलाज करके कोई फायदा नहीं। और जैसे ही दिमाग स्वस्थ होगा, कनेक्शन वापस जुड़ जाएगा और हाथ काम करने लगेगा, और वो लकवा भी खत्म हो जाएगा!

हमारे देश को भी बेरोजगारी नामका लकवा हो गया है और युवा नामका हाथ स्वस्थ होने पर भी काम नहीं कर पा रहा है। और सारी सरकारों ने केवल हाथ का ही इलाज किया, बेरोजगारी की नस तो ढूंढी ही नहीं!

तो क्या अब आपके मन में सवाल आ रहा है कि आखिर वो ऐसी कौनसी नस है? जिसे ढूंढने के लिए हमें समस्या की जड़ में जाना होगा। इसकी शुरुआत हम भारत से जुड़ी कुछ रोचक बातों से करते हैं!

essay on Berojgari ki samasya

भारत के लोग पूरी दुनिया में काम करते हैं, बड़ी कंपनियों के बड़े पदों पर हैं और ऐसा सिर्फ आज से ही नहीं बल्कि कई सालों से रहा है फिर भी भारत में इतनी बेरोजगारी है। भारत के लोग दुनिया के मुकाबले शारीरिक और बौद्धिक क्षमताओं में ज्यादा तेज भी हैं जैसे एक से अधिक भाषाएं जानना मल्टिटास्किंग के कई दूसरे उदाहरण देखने को मिलते हैं। इसके बावजूद भी भारत में इतनी बेरोजगारी सालों से है ये बड़े आश्चर्य की बात है!  भारत में ना साधन की कमी है ना संपत्ति की, हां हां मुझे पता है की ज्यादातर लोग तो मिडल क्लास हैं और उनके पास कोई खास संपत्ति या बहुत पैसा नहीं है। लेकिन मैंने भारत की बात की लोगों की नहीं।

भारत दुनिया भर में कई चीजों का निर्यात करता है जिससे भारत में काफी पैसा आता है। इसके अलावा भारत में कई बड़ी कंपनीज़ भी हैं और आसान शब्दों में कहें तो अमेजॉन जैसी बड़ी कंपनीज भारत के बाजारों की ओर इसीलिए तो आकर्षित हैं कि यहां पैसा है।


भारत समृद्ध फिर भी बेरोजगार क्यों?

जहां तक संपत्ति की बात है तो भारत जितनी संपत्ति दुनिया में कहीं नहीं। उदाहरण के लिए अमेरिका का ज्यादातर हिस्सा भूकम्प चक्रवात और बवंडर के खतरे में है। वहां के एक बहुत बड़े और महत्वपूर्ण शहर लास वेगास में कभिभी इतना भयानक भूकंप आ सकता है कि पूरा शहर ही तबाह हो जाए। इसके मुकाबले भारत के कुछ सीमित क्षेत्रों में ही भूकम्प का खतरा है और यहां चक्रवात सिर्फ तटीय क्षेत्रों में ही आते हैं वो भी सिर्फ बरसात के मौसम में।

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पानी एक प्राकृतिक साधन भी है और इसे संपत्ति भी माना जाता है लेकिन पूरी दुनिया में बरसात का मौसम सिर्फ भारत में है बाकी देशों में बारिश मुख्यत: गर्मी में होती है जिसका कोई  भरोसा नहीं होता।

थार रगिस्तान को छोड़ कर भारत की लगभग सारी जमीन उपजाऊ है जहां अनाज के साथ बहुत ही अद्भुत औषधियां भी होती हैं जबकि अफ्रीका में सहारा रेगिस्तान इतना बड़ा है कि कई देशों तक फैला है। रशिया में हर जगह बर्फ ही बर्फ है इसलिए जब बर्फ पिघलती है तो वहां मुश्किल से कुछ जगहों पर खेती हो पाती है वो भी सिर्फ एक दो महीनों के लिए। यहीं हाल यूरोप के ज्यादातर देशों का है। ऑस्ट्रेलिया में भी मिट्टी और पानी कम पत्थर ज्यादा हैं। और बिचारा जापान तो पूरा का पूरा देश ही ज्वालामुखी पर बना है। जापान की धरती लावा के ठंडे होने से बनने वाले टापू पर स्थित है! इसके अलावा भारत के जंगल, संकृती, आर्किटेक्चर और कलाएं तो विश्वप्रसद्ध हैं ही।

इसलिए भारत में तो रोजगार सबसे ज्यादा उपलब्ध होना चाहिए था। और ऐसा था भी हम सब जानते हैं कि भारत की समृद्धि के कारण उसे एक समय सोने की चिड़िया कहा जाता था। लेकिन क्या आपने कभी ध्यान दिया की उस समय वर्णव्यवस्था का भारत के हर कोने में पालन होता था। तो क्या हमारे पूर्वज मूर्ख थें जो उन्होंने वर्ण व्यवस्था बनाई? और अपनी खुशी से सब लोग उसका पालन करते थे?

उनकी समृद्धि ही इस बात का सबूत है कि वो मूर्ख नहीं थे। जब यूरोपियन सिर्फ जंगलियों की तरह लड़ते थे तो हमारे पूर्वजों ने द्वारिका हरैपा मोंजोदरो जैसे शहर बनाएं, जब विश्व में विद्यालयों से सब अनजान थे तो हमारे पूर्वजों ने तक्षशिला, नालंदा जैसे विश्वविद्यालय बनाएं। जब दुनिया को इलाज का ठीक से ज्ञान भी नहीं था तो महर्षि सुश्रुत जैसे हमारे पूर्वजों ने प्लास्टिक सर्जरी की। कुछ लोगों को ये जानकर आश्चर्य हो रहा होगा लेकिन इसके सारे सबूत और लिखित इतिहास मौजूद है! जब दुनिया के लोग आदि मानव थे तो हमारे पूर्वजों ने समुद्र पर पुल खड़ा कर दिया और वो श्री राम सेतु लाखों सालों से समुद्र के लहरों को झेलने के बाद भी आज भी इतना विशाल है कि सैटेलाइट से भी देखा जा सकता है।

इतने बुद्धिमान लोगों ने अगर वर्णव्यवस्था बनाई तो उसके पीछे भी जरूर कोई कारण होगा।

आपने बच्चों को अपने मां बाप की नकल करते देखा है। अगर हां तो आप ये देखकर जरूर हैरान हुए होंगे कि इतनी कम उम्र में वे इतनी अच्छी नकल कैसे कर लेते हैं? क्या उन्हें कोई ट्रेनिंग देता है? नहीं ये हमर प्राकृतिक गुण है और वर्णव्यवस्था भी इसी पर आधारित था ताकि हम इस परकृतिक खासियत का फायदा उठा सकें किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं।

इसके उदाहरण पूरी दुनिया में देखने को मिलते हैं। बॉलीवुड में राजकपूर से लेकर करिश्मा कपूर रणवीर कपूर तक सब लाजवाब एक्टर हैं। अमिताभ बच्चन का बेटा अभिषेक बच्चन भी पिता की तरह बढ़िया अभिनेता है। महेश भट्ट की बेटी आलिया भट्ट तो आप जानते ही होंगे। रिलायंस जियो के मालिक मुकेश अंबानी भी अपने पिता की तरह माहिर उद्योगपति हैं। Hundai BMW Ford Toyota Volkswagen ये सब वो कंपनीज हैं जिन्हें अपने पिता से सीखकर बच्चों ने बनाई और उनके भी बच्चे चला रहे हैं।


बेरोजगारी की समस्या और शिक्षा व्यवस्था (Unemployment and Education)

Unemployment and Education

हमारी शिक्षा प्रणाली ऐसी है जिसमें बच्चों की प्रतिभा और प्राकृतिक गुणों से किसी को कोई लेना देना नहीं नहीं। सबको एक ही चूहों की दौड़ में डाल दिया जाता है और एक ही चीज रटने की अपेक्षा की जाती है। लेकिन वर्णव्यवस्था में ये कमी नहीं थी। सब लोग अपने माता पिता के गुणों को सीखकर उसे निखारते थे उनके अनुभवों के जरिए अपने पारिवारिक व्यवसाय को आगे बढ़ाते थें। इसीलिए भारत के कपड़े दुनिया में सोने के भाव बिकते थे यहां के मसाले दुनिया में सबसे अच्छी मानी जाती थी, यहां पर सीखने पढ़ने के लिए दुनिया भर से लोग आते थे, यहां के क्षत्रिय इतने पराक्रमी थे कि कोई उनसे सीधे टक्कर नहीं ले सकता था और अगर लिया तो सिकंदर जैसों को भी हारना पड़ता था। यहां के शिल्पकार इतने कुशल थे कि पत्थरों के पहाड़ को काटकर कोणार्क जैसा मंदिर बना देते थे। उस समय भारत में कोई बेरोजगार नहीं था।

फिर ऐसा क्या हुआ कि जतिव्यवस्थ रोजगार देने के बजाए दंगे फसाद का कारण बन गई? वरदान की जगह श्राप जैसी हो गई?

इसे समझने के लिए आपको मधुमक्खियों की कहानी सुनना होगा।


मधुमक्खियों की कहानी!

एक जगह पर मधुमक्खियों का एक बहुत बड़ा साम्राज्य था।

example of honeybees to understand unemployment

क्या? साम्राज्य वो भी मधुमक्खियों का?

 कहानियों की यहीं तो खासियत होती है कि वहां कुछ भी हो सकता है। तो अगर आप को ये कहानी सुनना है तो आपको भी अपनी कल्पना को सीमाओं से आजाद करना होगा।

मधुमक्खियों के उस राज्य में हर जगह शहद ही शहद था वे बहुत ही सुखी और संपन्न थीं। मजदूर मधुमक्खियां अपनी खुशी से अच्छी क्वालिटी का शहद लेकर आती। सैनिक मधुमक्खियों ने ऐसी घेरा बंदी की की कोई उनके शहद को चुरा नहीं सकता था, उनकी एकता और समर्पण देखकर कोई  उनसे युद्ध की सोचता भी नहीं था। रानी मक्खी ने अपने नेतृत्व से हर जगह सुव्यवस्था बना रखी थी और सभी चीजों का ठीक से मैनेजमेंट कर रखा था।

मधुमक्खियों की इस खुशहाली को देखकर गंदगी की मक्खियों को बड़ा जलन होता था लेकिन सैनिक मधुमक्खियों के डर से वे कुछ कर नहीं पाती थी।

why unemployment is there

एक दिन गंदगी की मक्खियों ने मधुमक्खियों से विनती की कि वे भी उनकी तरह बनना चाहती हैं और अच्छा जीवन जीना चाहती हैं। मधुमक्खियों ने भलाई करने के विचार से गंदगी की मक्खियों का मदद करने का निश्चय किया। मधुमक्खियां उन्हें अपने साथ रखकर मिलजुलकर जीने का तरीका सिखाना चाह रही थीं। लेकिन गंदगी की मक्खियों पर भरोसा करना मधुमक्खियों की बहुत बड़ी भूल थी। असल में जीवन को सुधारने की बात गंदगी की मक्खियों का सिर्फ एक बहाना था ताकि वे मधुमक्खियों के राज्य में घुसपैठ कर सके क्योंकि युद्ध करके मधुमक्खियों को हराना असंभव था। इस चाल से गंदगी की मक्खियों ने मधुमक्खियों के राज्य में सफलता पूर्वक घुसपैठ कर लिया। अब गंदगी की मक्खियां घुसपैठिया बन कर आराम से मधुमक्खियों के राज्य में रहने लगी और तरह तरह की साजिशे करने लगीं।


मक्खियों के षड्यन्त्र से मधुमक्खियों की एकता का अंत

घुसपैठियों ने सारी मधुमक्खियों को आपस में भड़का दिया।

मधुमक्खियों के मजदूरों को कहा की सारी मेहनत तो वे करती हैं इसलिए सारे राज्य पर उनका अधिकार है और उनका ही सबसे अधिक सम्मान होना चाहिए। उनकी मेहनत उनका कर्तव्य नहीं बल्कि रानी मधुमक्खी का अत्याचार है।

घुसपैठियों ने सैनिक मधुमक्खियों से कहा की बाकी मधुमक्खियों के लिए अपनी जान दाव पर लगाना उनके साथ अन्याय है। इसलिए सैनिक मधुमक्खियों को किसिकी रक्षा नहीं करना चाहिए।

 घुसपैठियों ने एक लालची मधुमक्खि को रानी की पद्वी देकर मुखिया बनाने का लालच दिया और रानी की हत्या करने को कहा। इसके लिए उन्होंने योजना बनाई।

एक दिन सैनिक मधुमक्खियां सुरक्षा की व्यवस्था देखने गई थीं, मजदूर मधुमक्खियां भी शहद लाने गई थीं। घुसपैठियों के बहकावे में आकर उस लालची मधुमक्खी ने मौके का फायदा उठाया और रानी मक्खी की हत्या कर दी। इससे वहां की व्यवस्था बिगड़ गई।

मजदूर और सैनिक मधुमक्खियों ने अपना अपना वर्चस्व प्रस्थापित करने का इसे अच्छा अवसर समझा और आपस में लड़ गईं। ये युद्ध बड़ा भयानक था सब बर्बाद हो गया कई मधुमकखियां घायल हो गईं कुछ के शरीर के टुकड़े हो गए।


मक्खियों की चालबाजी और मधुमक्खियों की हार

आज घुस्पैठियों का सपना सच हो गया। मधुमक्खियों की बुरी हालत का घुसपैठियों ने फायदा उठाया और उस साम्राज्य पर अपना कब्जा कर लिया।

अब परिस्थिति एकदम बदल चुकी थी किसी समय सुख समृद्धि से भरा साम्राज्य अब बेहाल ही चुका था। जिन मधुमक्खियों को भरपूर शहद और सारी सुविधाएं उपलब्ध थीं अब उनके सारे अधिकार छीने जा चुके थे। लेकिन घुसपैठियों को तो अब सब कुछ उपलब्ध था, उन्होंने सारे शहद पर भी कब्जा कर लिया था।

लेकिन अब उन्हें एक बड़ा डर सताने लगा। अगर मधुमक्खियों में थोड़ी सी भी एकता हुई तो वे अपना राज्य वापस ले लेंगी और घुसपैठियों को उनके किए की सजा देंगी। इसलिए घुसपैठियों ने मधुमक्खियों में फुट बढ़ाने के लिए और नए नए षड्यंत्र रचे ताकि वे आपस में ही उलझे रहें और घुसपैठियों की सच्चाई कभी सामने ना आए। इन षड्यंत्रों की सबसे बड़ी शिकार रानी मधमक्खी के रिश्तेदार थे क्योंकि घुसपैठियों जानती थी की रानी मधुमक्खिय उनकी चाल आसानी से समझ सकती थी और मौका मिलते ही सारी मधुमक्खियों को फिर से एक कर सकती थीं। फिर घुसपैठियों को इस साम्राज्य से हाथ धोना पड़ता।

 मधुमक्खियों का आपसी मतभेद कभी खत्म ना हो इसके लिए घुसपैठियों ने कई तरीकों से झूठा प्रचार किया, झूठी किताबे छपी, झूठे समाचार फैलाए। उन्होंने मधुमक्खियों प्रतिभा और खासियतों को जात बना दिया और जात को गाली की तरह पेश करने लगे। अगर रानी मधुमक्खी हजारों अच्छे काम करती तो उसे दबाया जाता था लेकिन अगर गलती से भी उससे किसी का थोड़ा सा भी नुक़सान होता तो उसे हजारों बार बढ़ा चढ़ा कर प्रचार किया जाता था और बुरा साबित कर दिया जाता था।

लेकिन धीरे धीरे कुछ समझदार मधुमक्खियों के सामने घुसपैठियों का सच आने लगा। उनकी देशभक्ति फिर से जाग गई और और अपने साम्राज्य को आजाद कराने के लिए वे संघर्ष करने लगें। घुसपैठियों ने इस क्रांति को रोकने के लिए बड़े भयानक कदम उठाएं, बहुत अत्याचार किए। लेकिन मधुमक्खियों की क्रांति नहीं रुकी। फिर घुसपैठियों ने एक चाल चली। उन्होंने मधुमक्खियों की परेशानी दूर करने के नाम पर एक राजनीतिक पार्टी बनाई। इस पार्टी का मकसद था मधुमक्खियों की आवाज उठाना और उनकी परेशानी दूर करना। लेकिन इसका असली मकसद था मधुमक्खियों को गुमराह करना, उन्हें क्रांति के रास्ते से भटकना। इस पार्टी का नाम रखा गया ग्रेस। शुरुवात में गस्पैठियों को कोई कामयाबी नहीं मिली क्योंकि ग्रेस पार्टी की सारी सदस्य मधुमक्खियां बहुत देशभक्त थी। इसलिए उन्होंने क्रांति को और आगे बढ़ाया। लेकिन धीरे धीरे घुसपैठियों ने ग्रेस पार्टी से क्रांतिकारियों को निकालकर गद्दारों का भर्ती कर दिया। और ग्रेस पार्टी घुसपैठियों की कठपुतली बन गई। लेकिन तब तक क्रांति की मशाल ने आग का रूप ले लिया और घुसपैठियों को मधुमक्खियों को आजादी देनी पड़ी।

लेकिन घुसपैठियों को अब भी यहीं डर था कि कहीं मधुमक्खियां अपना साम्राज्य फिर खड़ा कर के बदला लेने के लिए घुसपैठियों पर आक्रमण ना कर दें। इसीलिए आजादी के समय घुसपैठियों ने शर्त रखी कि उनके नियमों को ही नए देश के संविधान का रूप दिया जाए। अपने नियम, कानून, किताबें और ग्रेस पार्टी के जरिए उन्होंने मधुमक्खियों की संस्कृति के खिलाफ बहुत दुष्प्रचार किया। और मधुमक्खियों ने अपना स्वाभिमान और आत्मविश्वास खो दिया। इसकी वजह से वे रोजगार जैसी सारी जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर रहने लगीं।


मन की गुलामी

इसके अलावा बंटवारा करने के और फुट डालने के भी कई उपाय किए गए। जिसकी वजह से मधुमक्खियों का साम्राज्य 70 साल तक विकास नहीं कर पाया! अब वे अपनी प्रतिभाओं को बुरा समझने लगी और पारिवारिक काम को करने में शर्म और अपमान का अनुभव करने लगीं क्योंकी वे अपने गौरव को खो चुकी थीं और अपने महान इतिहास को नहीं जानती थीं। इसलिए अब उन्हें नए रोजगार की तलाश करनी पड़ रही थी। इसकी वजह से बेरोजगारों की संख्या बहुत बढ़ गई। भले ही उन मधुमक्खियों के पास हुनर की कोई कमी नहीं थी लकिन उनका सारा धन लूटा जा चुका था और स्वाभिमान और आत्मविश्वास ना होने की वजह से वे नए व्यवसाय और व्यापर करने की हिम्मत नहीं कर पाती थी। इस वजह से दर्जनों सरकारों के दशकों के प्रयास के बावजूद भी रोजगार की समस्या का समाधान नहीं हो सका!

उम्मीद है आपने इस कहानी के पीछे छुपे अर्थ को समझ लिया होगा।

ये असल में हमारी याने भारत की ही कहानी है। मधुमक्खियां भारतीय हैं, शहद से भरा साम्राज्य सोने की चिड़िया है, घुस्पैठिया  अंग्रेज हैं, मधुमक्खियों का प्रकार भारतीयों कि जाती है जैसे मजदूर शूद्र और वैश्य, सैनिक क्षत्रिय और रानी ब्राम्हण है। ग्रेस पार्टी कांग्रेस पार्टी है।

इसे जानकर अब आप के में बहुत से विचार आ रहे होंगे।

तो अब सवाल उठता है की क्या इस बेरोजगारी की समस्या को दूर किया जा सकता है?

हां किया जा सकता है


बेरोजगारी की समस्या दूर करने के उपाय (Solution for Berojgari ki samasya)

लेकिन हमें पहले अपने आप को समझना होगा। अगर सभी के पिता अपने काम में अपने बेटों को लगा दें तो लाखों लोगों को रोजगार मिल सकता है। मैं ये नहीं कह रहा कि उन्हें अपने ड्रीमजोब के बारे में नहीं सोचना चाहिए लेकिन जब तक वो ना मिले तब तक पैसे और अनुभव पाने के लिए उन्हें ऐसा करना चाहिए।

education se berojgari ki samasya ka upay

 इसके अलावा अगर भारत में शिक्षा व्यवस्था में सुधार किया जाएं तो बहुत बड़ा फर्क पड़ सकता है। इस समय की शिक्षा व्यवस्था ऐसी है कि जबतक कोई अपनी शिक्षा पूरी करे उससे पहले ही उसपर जिम्मेदारियों का बोझ और कमाने का दबाव आ जाता है। आजकल जिंदगी को सिर्फ साठ साल लंबा माना जाता है जिसमें से 25 से 30 साल की उम्र सिर्फ पढ़ने में निकल जाती है तो भी रोजगार की गारंटी नहीं!

जिन कॉलेज में हजारों विद्यार्थी होते हैं जरा सोचिए वो कॉलेज कितनी बड़ी संख्या में रोजगार बना सकते हैं क्योंकि जितने ज्यादा लोग होंगे नया काम भी तो उतनी ही तेजी से किया जा सकेगा। स्कूल से ही बच्चों को उनकी प्रतिभा और रुचि के हिसाब से रोजगार के अलग अलग क्षेत्रों की ओर बढ़ाना चाहिए।

इसके अलावा लोक संख्या नियंत्रण भी बहुत जरूरी है। अगर सभी पचास करोड़ युआओं के 4-4 बच्चे हों तो सारी आबादी तीन सौ करोड़ के ऊपर चली जाएगी और सबको भुखो मरना पड़ेगा, देश का सारा पानी भी सुख जाएगा क्योंकी ना हमने तालाब को छोड़ा है नाही पेड़ और जंगल तो कब के नष्ट हो चुके हैं

आपके मन में भी इस समस्या के जो हल आ रहे हैं उन्हें आप कॉमेंट में लिख सकते हैं ताकि सबके साथ भारत सरकार को भी उसकी जानकारी मिल सके।


जातिव्यवस्था की शक्ति (Cast is Power)

अगली बार जब आप किसी दलित को देखें तो जान लीजिए की उसके अंदर अनलिमिटेड स्टैमिना है

अगर व्यापारी जिसे वैश्य वर्ण कहा जाता था उसे देखे तो समझ जाइए की उससे बढ़िया बिजनेस दुनिया में कोई नहीं कर सकता

अगर क्षत्रिय को देखे तो समझ जाइए की वो आपको हर दुश्मन से बचा सकता है

अगर ब्राम्हण को देखें तो समझ लीजिए की जो जवाब आपको गूगल से ना मिले उसे भी वो बता सकता है!

nai company se berojgari dur karna

 अगर किसी कंपनी के सभी कर्मचरियों को कह दिया जाए कि अब उनमें वर्कर मैनेजर और सीईओ की कोई कैटेगरी नहीं रहेगी, सब अपनी पसंद का पद चुन सकते हैं तो क्या वो कंपनी चल पाएगी? क्या वहां साधारण वर्कर का काम कोई करना चाहेगा? क्या उसके सारे करमचारी नहीं चाहेंगे कि वे सीईओ या मैनेजर बन जाएं?

इसलिए मैंने कहा था कि वर्णव्यवसथा बेवजह नहीं थी।

जरा सोचिए अगर जाती से फर्क नहीं पड़ता तो जो इंसानों को अपनी जात भुलाने के लिए कहते हैं वे खुद ही जवरों में जातियों को इतना महत्व क्यों देते हैं।

उदाहरण के लिए देसी कुत्ते को कोई नहीं पूछता लेकिन विदेशी कुत्ते अपने जात याने नस्ल के हिसाब से महंगे क्यों बिकते हैं। मतलब अगर भौंकने वाले कुत्ते का ब ब्रीड प्योर है तो वो सही तरीके से भौकेगा, अगर शिकारी कुत्ते का नस्ल शुद्ध है तो वह पक्के तौर पर शिकार करेगा ऐसा सोचकर उन्हें उची कीमतों पर बेचा जाता है। यहां भौंकना शिकार करना सूंघकर चीजों का पता लगाना कुत्तों की अलग अलग जातियों की प्रतिभा है। लेकिन अगर इंसानों में जातिगत प्रतिभा का कोई महत्त्व नहीं तो फिर कुत्तों में कैसे हो सकता है। इसी फर्क की वजह से कोई घोड़ा एक लाख का बिकता है तो कोई करोड़ो का यहीं गायों में भी होता है। इस आर्टिकल को पढ़ने के बाद अपने विचार आप कॉमेंट में लिख सकते हैं।


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